जो आप जान सकते हैं और जो नहीं, उन्हें अलग कीजिए
फ़ैसले से पहले छाँटिए कि अभी क्या सच में जाना जा सकता है, जैसे आपके मूल्य, आपकी असली मजबूरियाँ, ईमानदार समझौते। और क्या अभी जाना ही नहीं जा सकता, जैसे पाँच साल बाद आपको ठीक-ठीक कैसा लगेगा। अनजाने को और रिसर्च या और सोच से जानने लायक़ बनाने की कोशिश फ़ैसले को बस टालती है, असली अनिश्चितता को कम नहीं करती।
फ़ैसले को उसकी प्रक्रिया से परखिए, आख़िरी नतीजे से नहीं
अच्छी तरह लिए गए फ़ैसले का नतीजा भी बुरा हो सकता है, और लापरवाही से लिया गया फ़ैसला भी क़िस्मत से चल सकता है। नतीजे सिर्फ़ आपके चुनाव से तय नहीं होते। खुद को इस पर परखिए कि उस वक़्त आपके पास जो जानकारी और मूल्य थे, उनके आधार पर आपने फ़ैसला लिया या नहीं। इस पर नहीं कि बाद में दुनिया ने साथ दिया या नहीं।
यह पूछिए कि किसका पछतावा ज़्यादा होगा, कौन ज़्यादा पक्का है यह नहीं
जब नतीजा जाना ही नहीं जा सकता, तब पक्केपन की कसौटी काम नहीं आती, लेकिन पछतावे की अक्सर आती है। खुद से पूछिए कि अगर बात बिगड़ी, तो किसका पछतावा ज़्यादा होगा: जो आपने चुना, या जो नहीं चुना। यह सवाल अक्सर असली पसंद सामने ले आता है, तब भी जब 'कौन-सा चलने की ज़्यादा उम्मीद है' का जवाब पहले से दिया ही नहीं जा सकता।
सही पहला अंदाज़ा माँगने के बजाय, बदलाव की गुंजाइश रखिए
चूँकि नतीजा पहले से नहीं जाना जा सकता, जहाँ हो सके फ़ैसले में ही लचीलापन रखिए, जैसे आज़माने की अवधि, कोई चेकपॉइंट, बाहर निकलने का रास्ता। ताकि आप एक ही अटल अंदाज़े पर सब कुछ दाँव पर न लगाएँ। इससे 'क्या यह चलेगा' का सवाल 'अगर नहीं चला तो क्या मैं बदल सकता हूँ' जैसे जवाब देने लायक़ सवाल में बदल जाता है, और असल में सवाल अक्सर यही होता है।
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