देखिए, आपके फ़ैसले में कितना हिस्सा दूसरों की राय का है
जब ख़ुद पर भरोसा कम होता है, तो फ़ैसला पूरी तरह उस इंसान के हवाले कर देना आसान लगता है जिसने आख़िर में बोला हो, या जो सबसे ज़्यादा भरोसे से बोला हो। एक और राय लेने से पहले देखिए कि आप कितनी राय पहले ही इकट्ठा कर चुके हैं, और क्या आप अब भी जानकारी ढूँढ रहे हैं या बस किसी और से अपना फ़ैसला करवाना चाहते हैं।
बुरे नतीजे और बुरे फ़ैसले को अलग करके देखिए
ख़ुद पर भरोसा टूटने की जड़ अक्सर कोई एक फ़ैसला होता है जो ठीक नहीं बैठा, और उसे इस बात का सबूत मान लिया जाता है कि आपकी समझ पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन फ़ैसला समझदारी से, सोच-विचार कर लिया गया हो, तब भी नतीजा बुरा हो सकता है। यह आपकी समझ पर कोई फ़ैसला नहीं है। जब आने वाला कल पहले से जाना ही नहीं जा सकता, तो कभी-कभी ऐसा हो ही जाता है।
पहले छोटे, कम जोखिम वाले फ़ैसलों से भरोसा लौटाइए
ख़ुद पर भरोसा भी वैसे ही लौटता है जैसे किसी और पर, यानी पिछले अनुभवों के सहारे, किसी एक बड़ी छलाँग से नहीं। छोटी बातों पर बिना ज़्यादा लोगों से पूछे फ़ैसला करने की आदत डालिए, और देखिए कि आपकी अपनी राय कितनी बार ठीक निकलती है। यह बढ़ता हुआ सबूत किसी भी हौसला-अफ़ज़ाई वाली बात से ज़्यादा काम करता है।
ख़ुद पर भरोसे का मतलब पक्का यक़ीन होना नहीं है
ख़ुद पर भरोसा करने का मतलब 100% पक्का होना नहीं है। इसका मतलब है अपनी मौजूदा सबसे अच्छी समझ पर चलने को तैयार होना, यह जानते हुए कि बाद में उसमें बदलाव करना पड़ सकता है। अपनी समझ पर भरोसा करने के लिए पूरे यक़ीन का इंतज़ार करना, हमेशा इंतज़ार करते रहना है। इतने बड़े किसी भी फ़ैसले में, किसी के लिए भी, वह यक़ीन कभी आने वाला था ही नहीं।
अगर सबसे मुश्किल हिस्सा फ़ैसला नहीं, बल्कि उस पर अपनी ही समझ पर भरोसा करना है, तो OLENRI एक निजी जगह है जहाँ आप उसे खुलकर सोच सकते हैं, लिखकर या बोलकर। देखिए यह कैसे काम करता है →